बिहार में बच्चों की मौत, ज़िम्मेदार कौन?

बिहार में बच्चों की मौत, ज़िम्मेदार कौन?


 


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी में इन दिनों एक समानता है। दोनों ही नेता मीडिया से नाराज चल रहे हैं। अगर कुछ महीने छोड़ दिए जाएं, तो पिछले कुछ सालों से दोनों नेता राज्य की सता पर काबिज हैं, लेकिन अब बिहार में कुछ ही दिनों में 156 से अधिक बच्चों की मौत ने इनकी प्रशासनिक कुशलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, और इसीलिए जहां नीतीश कुमार अपनी जिम्मेदारियों के बारे में बात करने की बजाय मीडिया से मुंह फुलाए बैठे हैं, वहीं सुशील मोदी का हमेशा की तरह इस बार भी लालू-राबड़ी राग जारी है। लेकिन अब यह बात पहले करते हैं कि मुख्यमंत्री इन बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार क्यों हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि आज तक विशेषज्ञ भी एक्यूट एन्सिफेलाइटिस सिन्ड्रोम के फैलने के कारणो का पता लगाने में विफल रहे हैं, लेकिन बकौल नीतीश कुमार, इस बार स्वास्थ्य विभाग अधिकारी बीमारी की रोकथाम के लिए प्रचार-प्रसार करने में विफल रहे। खुद नीतीश कुमार ने भी चुनाव बाद की गई विभागवार समीक्षा में इस पहलू को नजरअंदाज किया। वैसे नीतीश कुमार के शासन काल में वर्ष 2014 के बाद इस बीमारी के मरीजों की तादाद में कमी आई है, और उसका कारण यही रहा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से ही इलाज के अधिकांश उपाय कर लिए गए, और उन्हें केंद्र सरकार के निर्देश पर मजबूत किया गया, लेकिन जैसा हर सरकारी काम के साथ होता है, बाद में सभी कान में तेल डालकर सो गए। खुद नीतीश कुमार को भी लग रहा होगा कि इस बार बच्चों की मौत की जिम्मेदारी उन पर है, क्योंकि उन्होंने बीमारी को गंभीरता से नहीं लिया। अधिकारियों के साथ की गई समीक्षा बैठक को अपने तक सीमित रखा और 15 दिन के बाद अस्पताल जाकर उन्होंने सफाई से लेकर डॉक्टर भेजने तक के जो फैसले किए (वे निश्चित रूप से सराहनीय हैं), वे उन्होंने कुछ दिन पहले दौरा कर ले लिए होते, तो निश्चित रूप से कई बच्चों की जान बच सकती थी। नीतीश अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे थे और उन्होंने जो समय दिल्ली में राजनीतिक परिचर्चा करने में बर्बाद किया, वह मुजफ्फरपुर के अस्पताल में गुजारा होता, तो आज समूचे मुल्क के मीडिया में उनकी जो जगहंसाई हो रही है, उससे बचा जा सकता था। वैसे, एक और भी कारण हैं, जिसके लिए नीतीश कुमार को कोई माफ नहीं कर सकता - वह है, स्वास्थ्य विभाग के कामों में उनकी कोई रुचि न होना। अगर उन्होंने इस विभाग में दिलचस्पी ली होती, तो आज अस्पताल बीमार नहीं होते। न डॉक्टर हैं, न नर्स. नीतीश हर मामले में लालू-राबड़ी शासनकाल से तुलना करते हुए आंकड़े पेश कर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं, लेकिन सच्चाई यही हैं कि सदर अस्पताल छोड़ दीजिए, कहीं भी किसी भी अस्पताल में एक्स-रे मशीन तक ठीक से काम नहीं करती, बच्चों के लिए सुविधाओं की बात तो रहने ही दीजिए। नीतीश जिस दिन अस्पतालों में आने वाले मरीजों और उनके रिश्तेदारों, भले ही मरीज ठीक होकर छुट्टी पाकर गए हों, या काल के गाल में समा गए हों, से मिलेंगे, और कारण जानने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें सच्चाई का पता चल जाएगा। इस बार इतनी तादाद में बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके कामों, और उनके दावों की पोल खोलकर रख दी है, सो, अब मीडिया से मुंह फुला लेने से न समस्या का समाधान होगा, न बच्चों की जान बचाई जा सकेगी। नीतीश कुमार को याद रखना होगा कि अगर ताली कप्तान को मिलती है, तो गाली भी कप्तान को ही मिलती है।
अब बात करते हैं सुशील मोदी की. हालांकि स्वास्थ्य विभाग से उनका कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन उन पर दोषारोपण इसलिए जरूरी है, क्योंकि सौ से भी ज्यादा बच्चों की मौत हो जाने पर भी उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे से इस्तीफा नहीं दिलवाया। मोदी वही राजनेता हैं, जो वर्ष 2013 में छपरा जिले में मिड-डे मील खाने के बाद हुई बच्चों की मौत पर महीनों तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस्तीफा मांगते रहे थे। वैसे तो मोदी को खुद ही इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे देना चाहिए था, क्योंकि वित्तमंत्री के रूप में उन्होंने ही स्वास्थ्य विभाग के बजट में कटौती की है, और पैसे के अभाव में ही भवन नहीं बने। सुशील मोदी ने खुद भी ट्वीट कर कहा था कि वह केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मिलकर मुजफ्फरपुर में बच्चों केप्ब्न् के लिए आर्थिक मदद मांगेंगे। राजनीतिक अखाड़े में हर रोज अपने विरोधियों को नसीहत देने वाले सुशील मोदी इस बात पर पूरी तरह मौन हैं कि स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे मुजफ्फरपुर में बीमार बच्चों से मिलने से पहले पार्टी के कार्यक्रमों में इतने सक्रिय क्यों थे, और क्या मोदी को मंगल पांडे से इसी आधार पर इस्तीफा नहीं ले लेना चाहिए। जब मोदी खुद नीतीश कुमार के साथ अस्पताल पहुंचे थे, और उनसे सवाल पूछा गया, तो वह मीडिया वालों को ही नसीहत देने लगे थे। सुशील मोदी ने आज तक इस बात पर भी कोई सफाई नहीं दी है कि आखिर वर्ष 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन द्वारा की गई घोषणा पर अब तक अमल क्यों नहीं किया गया है। बिहार में दूसरे ।प्प्डै की घोषणा के पांच साल बाद भी उसका शिलान्यास तक न हो पाने पर हर चीज में छह इंजन की सरकार की दुहाई देने वाले सुशील मोदी की चुप्पी को उनके समर्थक भी शर्मनाक बताते हैं। पिछले 14 वर्ष के दौरान चार साल को छोड़कर यह मंत्रालय हमेशा भाजपा के मंत्रियों के पास ही रहा है और उसके बावजूद अगर स्वास्थ्य विभाग बीमार है, तो भाजपा के मंत्रियों की बैठक में उपमुख्यमंत्री होने के नाते मौजूद रहने वाले सुशील मोदी जिम्मेदारी लेने से सिर्फ इसी तर्क से बच सकते हैं - हमसे पहले लालू-राबड़ी शासनकाल में किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली थी, तो हम क्यों लें।


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